My Photoज सुबह-सुबह अचानक होटल के दरीचे से झाँका तो डॉ श्याम गुप्त को बेंगळूरू में देखकर चौंक गया। अरे आप कहाँ? उन्होने मुसकुराते हुये कहा कि आजकल मैं भी बेंगळूरू में ही हूँ। अब कोई लखनऊ से आए और मैं न मिलूँ ऐसा कैसे हो सकता है। डॉ श्याम गुप्त एक शल्य-चिकित्सक हैं जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि उनका मानना है कि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश व राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर हो जाना ही है.... इनकी सात पुस्तकें प्रकाशित हैं। इनके प्रमुख ब्लॉग है- श्याम स्मृति....The world of my thoughts...श्याम गुप्त का चिट्ठा और आपका ब्लॉग। ये जुलाई 2008 से ब्लॉगिंग कर रहे हैं। 

डॉक्टर साहब ने बताया कि बंगलोर को भारत का बगीचा भी कहा जाता है। समुद्र तल से 949 मीटर की ऊँचाई पर कर्नाटक पठार की पूर्वी-पश्चिमी शृंखला सीमा पर स्थित यह शहर राज्य के दक्षिण पूर्वी भाग में है। शरद एवं ग्रीष्म ॠतु में खुशगवार मौसम के कारण निवास के लिए लोकप्रिय स्थान है, लेकिन यहाँ की बढ़ती औद्योगिक और घरेलू ज़रूरतों के लिये जल आपूर्ति एक समस्या है। यहाँ 910 मिमी वार्षिक वर्षा होती है। बंगलोर कन्नड़, तमिल और तमिल भाषा के लोगों के लिए सांस्कृतिक संगम का बिंदु है। मेरी जिज्ञासा बढ़ती गई जब वे इसके इतिहास से पर्दा हटाना शुरू किया। उन्होने कहा कि एक बार होयसल वंश के राजा बल्लाल जंगल में शिकार करने के लिए गए थे। किन्तु वह रास्ता भूल गए। जंगल के काफ़ी अन्दर एक बूढ़ी औरत रहती थी। वह बूढ़ी औरत काफ़ी ग़रीब और भूखी थी और उसके पास राजा को पूछने के लिए सिवाए उबली सेम (बींस) के अलावा और कुछ नहीं था। राजा बूढ़ी औरत की सेवा से काफ़ी प्रसन्न्न हुए और उन्होंने पूरे शहर का नाम बेले-बेंदा-कालू-ऊरू रख दिया। स्थानीय (कन्नड़) भाषा में इसका अर्थ उबली बींस की जगह होता है। इस ऐतिहासिक घटना के नाम पर ही इस जगह का नाम बेंगळूरू रखा गया है। लेकिन अंग्रेज़ों के आगमन के पश्चात् इस जगह को बंगलोर के नाम से जाने जाना लगा। लेकिन वर्तमान में दुबारा से इसका नाम बदलकर बंगलूरू कर दिया गया।

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डॉक्टर साहब से मिलने के बाद मैंने अगले पड़ाव की ओर रुख किया और बड़ी खामोशी से सृजन पाठ पर अग्रसर एक समर्पित ब्लॉगर सुधा भार्गव जी से मिलने पहुंचा। सुधा जी तूलिका सदनफूल और काँटेधूप- छांवबालकुंजमाता-पितापहला एहसास और बचपन के गलियारे सहित लगभग आधा दर्जन ब्लॉग संचालित करती हैं। कविता .कहानी संस्मरण मुक्तक ,आलेख आदि विधाओं पर उनकी  लेखनी इन  चिट्ठों पर गतिशील है। विभिन्न पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं  और विभिन्न संस्थाओं से इनका जुडाव है। इनका  प्रकाशित काव्य -संग्रह है  'रोशनी की तलाश में ', जिसके लिए इन्हें डा .कमला रत्नम पुरस्कार मिल चुका है। इनकी प्रकाशित बाल पुस्तकें हैं अंगूठा चूस, अहंकारी राजा, जितनी चादर उतने पैर पसार। इनकी तीसरी कृति 'राष्ट्रीय शिखर साहित्य सम्मान 'से अलंकृत हो चुकी है और प. बंगाल -की ओर से इन्हें  'राष्ट्र निर्माता पुरस्कार ' मिल चुका है। ये अगस्त 2009 से ब्लॉगिंग कर रही हैं।


सुधा जी के यहाँ चाय की चुसकियों के साथ साहित्य के गंभीर विषयों पर हम चर्चा में मशगूल थे, तभी एक नौजवान ब्लॉगर अमित झा  ने दरवाजे पर दस्तक दिया। शांत, सौम्य और मृदुभाषी अमित ने बताया कि मैं कुछ खट्टी कुछ मीठी नाम से मेरा एक ब्लॉग है जिसपर मैं अपनी सुखद अनुभूतियों को अंकित करता रहता हूँ। चलिये आज मैं आपको बंगलुरु घुमाता हूँ। आज मैं आपको एक ब्लॉगर की नज़र से बंगलुरु दिखाऊँगा। मैं उनके साथ हो चला, फिर उन्होने मुझे बारी-बारी से बंगलुरु घुमाते हुये कहा- "ये है बंगलोर - बंगलोरु (जो कह लें )फिर उन्होने मुझे विस्तार से समझाया कि क्यूँ कहते हैं बंगलोर को " है - टेक" सिटी ..।"

अमित के साथ मैं प्रातः बंगलौर दर्शन कर ही रहा था, मेरे साथ एक और ब्लॉगर साथ हो लिए। नाम है पी॰ एन॰ सुब्रह्मण्यम, जिनका ब्लॉग है मल्हार। अमित ने मुझे इस्कॉन मन्दिर, बंगलोर बुल-मन्दिर, महाराजा पैलेस, लालबाग गार्डन, स्टार लीला पैलेस आदि के दर्शन कराये और सुब्रह्मण्यम जी बातों ही बातों में उन सब चीजों की विशेषताओं पर प्रकाश डाला। हालांकि सुब्रह्मण्यम जी से मैंने केरल की संस्कृतियों के बारे में ज्ञान अर्जित की वह मेरे जीवन की अमूल्य धरोहर बन गई। वे अपने ब्लॉग मल्हार में केरल की सभ्यता और संस्कृति पर जी खोलकर लिखा है। जैसे-तिरुकुरल के प्रणेता तिरुवल्लुवर,  ग्राम देवी की प्रतिष्ठा में एक पर्व आदि।

My Photoअब बारी थी बंगलुरु छोड़ने की, सबसे विदा लेने के बाद अगले पड़ाव की बढ़ने का मन बना ही रहा था, कि तभी अर्चना जी का फोन आया,  कि कैसी चल रही है आपकी दशकीय ब्लॉग यात्रा । मैंने कहा सुखद । बातों ही बातों में उन्होने याद दिलाया कि एक नौजवान ब्लॉगर शेखर सुमन भी आजकल बंगलौर में ही हैं। फिर मैंने शेखर से मिलकर बंगलुरु से प्रस्थान करने की योजना बनाई, क्योंकि यहाँ से मुझे कोच्चि के लिए प्रस्थान करना था।

शेखर सुमन मूलत: बिहार के कटिहार के रहने वाले हैं और बंगलुरु में रहकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं। इनका ब्लॉग है खामोश दिल की सुगबुगाहट। इस ब्लॉग में प्रेमपरक काव्यमय अभिव्यक्तियों की भरमार है। शेखर अपने बारे में कहते भी हैं, कि एक मुसाफिर हूँ, जो तारों को देखता है, चाँद को सहलाता है, आसमान को बांधता है, सुबह की सूरज की किरणों में सुकून महसूस करता है... जिसने तितलियों की आखें पढने की कोशिश की है, जो जागती आखों से सपने देखता है... यहाँ बांटता है अपनी ज़िंदगी के कई अधखुले पन्ने, अनखुले एहसास...। उनका इस  एहसास में सचमुच गजब की कशिश है।

हमारी यात्रा का अगला पड़ाव था देवभूमि केरल - गॉड्स ओन कंट्री। केरल का पहला पड़ाव कोच्चि। बंगलुरु से कोच्चि की दूरी है 565 किमी। कोच्चि शहर, भूतपूर्व कोचीन, अरब सागर पर प्रमुख बंदरगाह, पश्चिम-मध्य केरल राज्य, दक्षिण-पश्चिम भारत में स्थित है। इसे पूर्व का वेनिस भी कहा जाता है। पूर्व में एक रियासत राज्य का नाम भी 'कोचीन' था, जो आजकल कभी-कभी एर्णाकुलम, मत्तनचेरी, फ़ोर्ट कोचीन, विलिंग्डन द्वीप, आइपिन द्वीप और गुंडू द्वीप को मिलाकर बनने वाले द्वीपों और कस्बों के समूह के लिए भी प्रयुक्त होता है। शहरी संकेद्रण में त्रिक्कारा, एलूरू, कलमस्सेरी और त्रिप्पुनिधुरा के इलाके शामिल हैं। 


बंगलुरु से कोच्चि पहुँचने  का मेरा एक ही उद्देश्य था  सारथी सरीखे सुसम्मानित ब्लॉग के स्वामी आदरणीय डॉ जांसन सी फिलिप 'शास्त्री ' जी (शास्त्री जे सी फिलिप) से मिलना। शास्त्री जी हिन्दी ब्लॉगिंग में मेरे आदर्श रहे हैं और इनके ब्लॉग लेखन और प्रतिभासंपन्न ब्लॉगर को पृत्साहित करने के हुनर से प्रभावित होकर ही मैंने ब्लॉग समीक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ा और सफल भी हुआ। कोच्चि के थ्रिक्काकरा मंदिर के पास रहते हैं शास्त्री जी। यह वामन देव मंदिर उनके घर का निकटवर्ती मंदिर है, पर गैर हिन्दू होने के कारण उनका भी प्रवेश वर्जित है। 

My Photoवाराणसी के  डॉ अरविंद मिश्र ने अपने एक संस्मरण में लिखा है, कि "शास्त्री जी एक साथ ही समस्त मानवीय सदवृत्तियों के पुंजीभूत रूप हैं -एक साथ ही दया करुणा मैत्री औदार्य के प्रतिमूर्ति -बोली तो इतनी मीठी है कि लगता है उसके लिए अन्नप्राशन अनुष्ठान के समतुल्य ही उनका कोई जिह्वा मधुलेपन संस्कार हुआ होगा . एक परफेक्ट इसाई जेंटलमैन हैं अपने शास्त्री जी ..एक आदर्श ईसाई के लिए सहज ही .सेवाभाव की ऐसी परिपूर्णता शास्त्री दंपत्ति में है कि उसका साक्षात्कार मुझे उनके उस अल्पकालिक स्वागत सात्कार से ही हो गया ...। " वहीं  दिल्ली की नीलिमा ने भी अपने एक संस्मरण में इस बात की चर्चा की है कि "दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर कोच्चि में हमारे कोई परिचित रहते हैं और उनसे पहली बार वर्चुअल स्पेस से बाहर मुलाकात होगी - हम रोमांचित थे ! ठीक आठ बजे होटल की लॉबी में दरवाज़ा खोल कर प्रवेश करते हुए शास्त्री जी ने हमें और हमने शास्त्री जी को पहली ही नज़र में पहचान लिया ! मसिजीवी से जीभर गले मिलते हुए और मुझसे आत्मीय अभिवादन का आदान -प्रदान करते हुए शास्त्री जी बेहद चिर -परिचित लगे !" 

शास्त्री जी एक वैज्ञानिक (भौतिकी, औषध शास्त्र, पुरावस्तु शास्त्र) हैं एवं भारतीय सामाजिक नवोत्थान के लिये चिट्ठालेखन करते हैं।  उनका मुख्य चिट्ठा सारथी पर है।  उन्होंने 3 भाषाओं में 70 से अधिक पुस्तकें एवं 7000 से अधिक लेखों की रचना की है एवं उनके द्वारा रचित 10,00,000 से अधिक ईपुस्तकें प्रति वर्ष वितरित होती हैं। 

My Photoकोच्चि के बाद अगला पड़ाव चेन्नई था। एर्नाकुलम रेलवे स्टेशन पर मेरी मुलाक़ात राजधानी एक्स्प्रेस के एक लोको पायलट जी॰ एन॰ शा से हुई। जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि मैं भी ब्लॉगर हूँ तो उनकी आत्मीयता बढ़ती गई। उन्होने बताया कि वे आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिला अंतर्गत गुंटकल के रहने वाले है। 

शा आशावादी हैं, कहते हैं कि "मै समाज और जीवन के हर क्षेत्र में अनुशासित हूँ । अच्छे लोग और अच्छे कार्यो का आदर करता हूँ। सभी बुराईयों का विरोधक हूँ। मेरे सभी पृष्ठों और ब्लोगों को पढ़िए और आनंद की अनुभूति कीजिये। अब यदि सफर में साथ हो लोको पाइलट और वह भी ब्लॉगर तो सफर कितना रोमांचक होगा अंदाज़ा लगा लीजिये।"  इनका ब्लॉग है- बालाजी , जिसमें सारे पोस्ट रेल से सनवनधित विषयों पर आधारित है, जैसे- ग्राहक सेवा केंद्र, राजधानी एक्सप्रेस रुक गयी, ऐसा होता है अनुशासन, धीमे चलिए , पुल कमजोर है, रेल बचाओ अभियान आदि।

हालांकि चेन्नई पहुँचने से पूर्व मेरी नज़र एक और ब्लॉग पर पड़ी नाम था कोचीन ब्लॉगर । इस ब्लॉग को आप हिन्दी में अनुवाद करके यहाँ पढ़ सकते हैं। यह ब्लॉग वैसे तो अँग्रेजी में है, किन्तु केरल के बारे में अच्छी और सच्ची जानकारियों से युक्त है। इस ब्लॉग की जानकारियों को आत्मसात करते-करते मेरी मुझे नींद लग गई और जब आँखें खुली तो सामने चेन्नई था।

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चेन्नई शहर (भूतपूर्व मद्रास), तमिलनाडु राज्य की राजधानी, दक्षिणी भारत, बंगाल की खाड़ी के कोरोमण्डल तट पर स्थित है। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई भारत के चार महानगरों में से एक है। समुद्र किनारे बसे इस शहर में बंदरगाह भी है और इसे पहले मद्रास के नाम से जाना जाता था। मद्रास मछुआरे के गाँव मद्रासपटनम का छोटा रूप था। जहाँ ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने 1639-40 में एक क़िले और व्यापारिक चौकी का निर्माण किया था। उस समय सूती कपड़े की बुनाई एक स्थानीय उद्योग था और अंग्रेज़ों ने बुनकरों तथा स्थानीय व्यापारियों को क़िले के आसपास बसने के लिए बुलाया। 1652 तक फ़ोर्ट सेंट जार्ज फ़ैक्ट्री को प्रेज़िडेंसी की प्रतिष्ठा मिल गई और 1668 और 1749 के बीच कम्पनी ने अपने नियंत्रण का विस्तार किया। 1801 के लगभग अन्तिम स्थानीय शासक से उसकी शक्तियाँ छीन ली गईं और अंग्रेज़ दक्षिण भारत के स्वामी बन गए। तब मद्रास उनकी प्रशासकीय तथा व्यापारिक राजधानी बन गया।

चेन्नई का मरीना बीच विश्व का दूसरा सबसे बड़ा बीच है। यह शहर शिष्टाचार, सौम्यता और सभ्यता का प्रतीक है। अनेक मंदिर, क़िले, चर्च, पार्क, बीच, मस्जिद इस शहर की ख़ूबसूरती में चार चाँद लगाते हैं। इसे दक्षिण का गेटवे कहा जाता है। यह शहर दक्षिण की फ़िल्म इंडस्ट्री का हब भी है। चेन्नई ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा स्थापित प्रथम बंदोबस्त का शहर था।

अंतर्जाल पर जानकारी प्राप्त करने के क्रम में बी बी सी हिन्दी पर यह जानकारी  पढ़कर मैं भौचक रह गया कि "चेन्नई में, देश में अन्य जगहों से काफ़ी पहले, वर्ष 2001 में ही, ब्लागिंग शुरु हो गई थी। अब तो डॉक्टर, वकील, शिक्षक और ज्योतिषी, यानि समाज के अनेक वर्गों के लोग ब्लागिंग करते हैं।  एक अध्ययन के अनुसार भारत में सबसे ज़्यादा ब्लागर चेन्नई में हैं।  यहाँ तक कि वर्ष 2003 में चेन्नई स्थित अन्ना विश्वविद्यालय ने ब्लागिंग पर एक राष्ट्रीय स्तर का सम्मेलन बुलाया था और विश्वविद्यालय में एक ब्लागिंग का कोर्स भी शुरु किया था। इंडिब्लॉगर के अनुसार चेन्नई में लगभग तीन हजार चार सौ चौरासी ब्लॉग हैं ।

एक लंबी यात्रा के पश्चात थकान थी। सोचा क्यों न ब्लोगर्स से मिलने का आज इरादा बदल दिया जाये और चेन्नई के सबसे प्रसिद्ध हिंदी सिनेमा लगाने वाले मल्टीप्लेक्स सत्यम सिनेमा में चलकर कोई हिन्दी फिल्म देखी जाए।
क्रमश:....... 

15 टिप्पणियाँ:

  1. ravindra ji,
    aapki is yaatra ka sukh hame aise mil raha hai , jaise ye yaatra ham hii kar rahe hia . kitne hi purane blogger mitro ke baare me dobara se padhne ko mil raha hai .

    aapkao saadhuwaad
    vijay

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  2. बहुत व्यस्त होते हुए भी आपने फोन रिसीव किया ...आभार और शेखर से मुलाक़ात भी की जानकर मन प्रसन्न हो गया . ..यात्रा में हम आपके पीछे ही चल रहे है ....मजा आ रहा है ....

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  3. आपकी इस यात्रा का लाभ मुझ जैसे अन्य पाठक भी उठा रहे हैं ! आपके माध्यम से प्रसिद्ध एवं नामचीन ब्लोगर्स से मिलना बहुत सुखद अनुभूति दे रहा है ! अगली कड़ी की प्रतीक्षा है ! साभार !

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  4. adbhat tara sansar se judkar sukh mila. main cuttack ja raha hoon. vahan ke bloggers kee jankari mil sake to.

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  5. ------सुन्दर ब्लॉग यात्रा
    ---मुलाक़ात के लिए धन्यवाद रवीन्द्र प्रभात जी ....
    ---- सुधा भार्गव जी के बचपन के गलियारे ..का आनंद मिला ...

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  6. ब्लॉग यात्रा का बहुत ही रोचकता से सन्योजन एवम प्रस्तुति

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